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देश8 जून, 2026 | 19:12

सचिन पायलट के RPCC चीफ बनने के दावों पर आया नया बयान, पूर्व कांग्रेस नेता ने किया बड़ा खुलासा

सचिन पायलट के RPCC चीफ बनने के दावों के बीच एक पूर्व कांग्रेस नेता का बड़ा बयान आया है

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सचिन पायलट के RPCC चीफ बनने के दावों पर पूर्व कांग्रेस नेता का बड़ा बयान

सचिन पायलट के RPCC चीफ बनने के दावों के बीच एक पूर्व कांग्रेस नेता का बड़ा बयान आया है। उन्होंने कहा कि पायलट के खिलाफ अशोक गहलोत नहीं हैं।

सचिन पायलट के RPCC चीफ बनने के दावों पर पूर्व कांग्रेस नेता का बड़ा बयान

राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर संगठनात्मक बदलावों को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। कांग्रेस पार्टी के भीतर चल रही हलचल के बीच सचिन पायलट के RPCC चीफ (राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष) बनने के दावों को लेकर एक नया मोड़ सामने आया है। इस पूरे मामले पर पार्टी के एक पूर्व वरिष्ठ नेता ने चौंकाने वाला बयान दिया है।

पूर्व नेता के इस बयान ने जयपुर से लेकर दिल्ली तक के राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है। अब तक माना जा रहा था कि राज्य में गुटबाजी की वजह से फैसले अटके हुए हैं। लेकिन इस नए खुलासे ने अंदरूनी समीकरणों को एक अलग नजरिए से देखने पर मजबूर कर दिया है।

राजस्थान कांग्रेस में नई हलचल

पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में यह खबर तैर रही थी कि सचिन पायलट को फिर से प्रदेश कमान सौंपी जा सकती है। उनके समर्थक इस बात को लेकर काफी उत्साहित नजर आ रहे थे। जगह-जगह बैठकों का दौर भी शुरू हो चुका था।

इसी बीच पार्टी छोड़कर जा चुके एक वरिष्ठ नेता ने इस पूरे घटनाक्रम पर अपनी राय रखी है। उन्होंने कहा कि मीडिया में चल रही खबरें जमीनी हकीकत से काफी अलग हैं। पार्टी के भीतर फैसले किसी एक नेता के विरोध या समर्थन के आधार पर नहीं होते हैं।

पूर्व नेता का बड़ा दावा

कांग्रेस के पूर्व पदाधिकारी ने साफ किया कि सचिन पायलट के RPCC चीफ बनने के दावों के पीछे जो रुकावट बताई जा रही है, वह सही नहीं है। उन्होंने कहा कि आम तौर पर लोग मानते हैं कि अशोक गहलोत उनके रास्ते में खड़े हैं, लेकिन सच्चाई ऐसी नहीं है। उनके खिलाफ अशोक गहलोत नहीं बल्कि दिल्ली में बैठे कुछ अन्य समीकरण काम कर रहे हैं।

इस बयान ने उन लोगों को हैरान कर दिया है जो लंबे समय से दोनों नेताओं के बीच सीधे टकराव की बात करते आए हैं। पूर्व नेता के अनुसार, दोनों ही नेता अपनी-अपनी जगह राज्य में पार्टी को मजबूत करना चाहते हैं। उनके बीच वैचारिक मतभेद जरूर हो सकते हैं, लेकिन वे एक-दूसरे के राजनीतिक वजूद को खत्म नहीं करना चाहते।

अंदरूनी समीकरणों पर नई बहस

इस नए बयान के बाद राजस्थान की राजनीति को करीब से देखने वाले विश्लेषक भी अपनी रणनीति बदलने लगे हैं। अब यह समझने की कोशिश की जा रही है कि अगर गहलोत विरोधी नहीं हैं, तो फिर पायलट की ताजपोशी में देरी क्यों हो रही है। क्या केंद्रीय नेतृत्व किसी नए चेहरे की तलाश में है या फिर जातिगत समीकरणों को साधने की कोशिश की जा रही है।

राज्य में जल्द ही कई संगठनात्मक चुनाव और बदलाव होने वाले हैं। ऐसे में इस तरह के बयानों का आना कार्यकर्ताओं के बीच भ्रम की स्थिति पैदा करता है। जमीनी स्तर पर काम करने वाले लोग अब असमंजस में हैं कि वे किस गुट के साथ अपनी वफादारी दिखाएं।

दिल्ली दरबार का रुख अहम

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राजस्थान का फैसला अंततः दिल्ली से ही होना है। कांग्रेस आलाकमान इस समय देश के अन्य राज्यों के चुनावों और सांगठनिक मामलों में व्यस्त है। शायद यही वजह है कि राजस्थान के मामले को कुछ समय के लिए टाल दिया गया है।

पायलट समर्थकों का दबाव लगातार बढ़ रहा है। वे चाहते हैं कि आगामी चुनौतियों को देखते हुए जल्द से जल्द नेतृत्व परिवर्तन का फैसला ले लिया जाए। लेकिन केंद्रीय नेता फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं ताकि राज्य में दोबारा कोई बड़ा राजनीतिक संकट न खड़ा हो जाए।

कार्यकर्ताओं के मनोबल पर असर

इस खींचतान और रोज बदलते बयानों का सीधा असर आम कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ रहा है। जिला स्तर पर काम करने वाले नेताओं का कहना है कि जब तक नेतृत्व को लेकर स्थिति साफ नहीं होगी, तब तक वे जनता के बीच मजबूती से नहीं जा पाएंगे। विपक्ष भी इस स्थिति का पूरा फायदा उठाने की कोशिश कर रहा है।

स्थानीय स्तर पर पार्टी के कार्यक्रमों में भी इस गुटबाजी का असर साफ देखा जा सकता है। एक गुट के कार्यक्रम में दूसरे गुट के नेता दूरी बना लेते हैं। इस स्थिति को सुधारने के लिए एक मजबूत और सर्वमान्य अध्यक्ष की जरूरत महसूस की जा रही है।

आगामी चुनौतियों की तैयारी

राजस्थान में कांग्रेस के सामने अपनी जमीन को वापस पाने की एक बड़ी चुनौती है। पिछले चुनावों के बाद से ही पार्टी लगातार आत्ममंथन के दौर से गुजर रही है। ऐसे में समय रहते संगठन को दुरुस्त करना बेहद जरूरी माना जा रहा है।

पायलट को अध्यक्ष बनाने के पक्षधर नेताओं का तर्क है कि युवाओं के बीच उनकी लोकप्रियता का फायदा पार्टी को मिल सकता है। वहीं दूसरी तरफ, पुराने और अनुभवी नेताओं का मानना है कि सभी वर्गों को साथ लेकर चलने वाले चेहरे को ही आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

फैसले का इंतजार बरकरार

फिलहाल राजस्थान कांग्रेस में सस्पेंस (संदेह की स्थिति) लगातार बना हुआ है। पूर्व नेता के बयान ने भले ही अशोक गहलोत को इस विवाद से थोड़ा दूर करने की कोशिश की हो, लेकिन पायलट के भविष्य को लेकर सवाल अभी भी जस का तस बना हुआ है।

अब देखना होगा कि आने वाले दिनों में कांग्रेस आलाकमान इस असमंजस को कैसे दूर करता है। क्या सचिन पायलट को उनकी पुरानी जिम्मेदारी वापस मिलेगी या फिर राजस्थान की राजनीति में कोई तीसरा कोण उभरकर सामने आएगा। कार्यकर्ताओं की नजरें अब सीधे दिल्ली से आने वाले अगले आदेश पर टिकी हुई हैं।

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