अभिषेक बनर्जी का पद छीनने की तैयारी, टीएमसी में बड़ी बगावत

लोकसभा में अभिषेक बनर्जी को संसदीय दल के नेता पद से हटाने की तैयारी शुरू हो गई है। टीएमसी के बागी गुट ने इस संबंध में एक बड़ा ऐलान किया है।
पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के अंदरूनी हालात इस समय बेहद नाजुक मोड़ पर पहुंच चुके हैं। पार्टी के भीतर सुलग रही असंतोष की आग अब देश की संसद तक पहुंच गई है। लोकसभा में पार्टी के कद्दावर नेता अभिषेक बनर्जी को उनके अहम पद से हटाने की तैयारी शुरू हो चुकी है।
पार्टी के भीतर उभरे एक नए बागी गुट ने खुलेआम इस बात का ऐलान कर दिया है कि वे लोकसभा में पार्टी के नेतृत्व में बदलाव चाहते हैं। इस घोषणा के बाद से ही कोलकाता से लेकर दिल्ली तक के राजनीतिक गलियारों में भारी हलचल देखी जा रही है। तृणमूल कांग्रेस के कई सांसद इस समय गुपचुप बैठकों में हिस्सा ले रहे हैं।
टीएमसी के भीतर बड़ी हलचल
संसद के आगामी सत्र के ठीक पहले पार्टी के भीतर इस तरह की बगावत सामने आना कई तरह के संकेत दे रहा है। सूत्रों के मुताबिक पिछले कई महीनों से पार्टी के पुराने नेताओं और युवा नेताओं के बीच तालमेल ठीक नहीं चल रहा था। अब यह विवाद खुलकर जनता के सामने आ चुका है।
पार्टी के वरिष्ठ नेता इस बात से नाराज हैं कि फैसले लेते समय उनकी राय को नजरअंदाज किया जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ युवा नेताओं का मानना है कि पार्टी को नए विचारों और आक्रामक रणनीति की जरूरत है। इसी खींचतान का नतीजा है कि अब शीर्ष नेतृत्व पर खतरा मंडरा रहा है।
बागी गुट ने खोले पत्ते
तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों के इस गुट ने दिल्ली में एक गुप्त स्थान पर बैठक की है। इस बैठक के बाद गुट के एक प्रमुख सदस्य ने मीडिया को जानकारी दी कि वे लोकसभा अध्यक्ष को एक पत्र सौंपने की योजना बना रहे हैं। इस पत्र में संसदीय दल के नेता को बदलने की मांग की जाएगी।
बागी नेताओं का दावा है कि उनके पास पर्याप्त संख्या में सांसदों का समर्थन मौजूद है। वे चाहते हैं कि संसद के भीतर पार्टी की आवाज को अधिक लोकतांत्रिक तरीके से उठाया जाए। इस गुट ने साफ किया है कि वे किसी भी कीमत पर अपनी मांगों से पीछे हटने वाले नहीं हैं।
अभिषेक बनर्जी की बढ़ी मुश्किलें
पार्टी में दूसरे सबसे शक्तिशाली नेता माने जाने वाले अभिषेक बनर्जी के लिए यह स्थिति किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। अब तक पार्टी के सभी बड़े फैसलों में उनकी मर्जी सर्वोपरि मानी जाती थी। लेकिन इस नए घटनाक्रम ने उनकी राजनीतिक जमीन को हिलाकर रख दिया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि लोकसभा में उनका पद जाता है, तो इससे पार्टी संगठन पर उनकी पकड़ कमजोर होगी। पश्चिम बंगाल के स्थानीय चुनावों के पहले इस तरह का संकट उनके नेतृत्व क्षमता पर भी सवाल खड़े करता है। अभिषेक के करीबी नेता अब नुकसान को कम करने की कोशिशों में जुट गए हैं।
लोकसभा में नेतृत्व का संकट
संसद के भीतर किसी भी पार्टी का संसदीय दल का नेता बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वह तय करता है कि सदन में पार्टी किस मुद्दे पर क्या रुख अपनाएगी। इस जिम्मेदारी को अब तक संभाला जा रहा था, लेकिन अब बागी गुट कामकाज के तरीके से असंतुष्ट है।
बागी गुट का आरोप है कि संसद के भीतर महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा के दौरान सभी सांसदों को अपनी बात रखने का समान अवसर नहीं मिलता। कुछ खास नेताओं को ही आगे बढ़ाया जाता है जिससे बाकी सांसद खुद को उपेक्षित महसूस करते हैं। इसी वजह से लोकसभा के भीतर नेतृत्व परिवर्तन की मांग जोर पकड़ रही है।
ममता बनर्जी का रुख अहम
इस पूरे विवाद में अब सबकी नजरें मुख्यमंत्री और पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी पर टिकी हुई हैं। पार्टी के भीतर जब भी कोई बड़ा संकट आता है, तो अंतिम फैसला उन्हीं का होता है। हालांकि इस बार मामला उनके अपने परिवार और पुराने वफादारों के बीच का है।
ममता बनर्जी ने अभी तक इस मामले पर खुलकर कोई बयान नहीं दिया है। सूत्रों का कहना है कि वे परदे के पीछे से दोनों गुटों को समझाने की कोशिश कर रही हैं। वे नहीं चाहतीं कि संसद के भीतर पार्टी की छवि खराब हो या विपक्ष को उन पर निशाना साधने का मौका मिले।
दिल्ली की राजनीति पर असर
पश्चिम बंगाल की इस अंदरूनी लड़ाई का सीधा असर देश की राजधानी दिल्ली की राजनीति पर भी पड़ना तय है। विपक्षी गठबंधन में तृणमूल कांग्रेस एक बहुत ही मजबूत ताकत मानी जाती है। यदि पार्टी के भीतर इस तरह का बिखराव होता है, तो इससे गठबंधन की ताकत भी प्रभावित होगी।
अन्य विपक्षी दल भी इस पूरे घटनाक्रम पर बारीक नजर रख रहे हैं। संसद सत्र के दौरान सरकार के खिलाफ एकजुट होने की योजना बना रहे विपक्ष के लिए यह एक बड़ा झटका साबित हो सकता है। आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि तृणमूल कांग्रेस इस आंतरिक संकट से कैसे उबर पाती है।


