विधायक मनप्रीत सिंह अयाली का बड़ा फैसला, खालिस्तान समर्थक अमृतपाल सिंह की पार्टी में हुए शामिल

शिरोमणि अकाली दल के बागी विधायक मनप्रीत सिंह अयाली ने अमृतपाल सिंह की पार्टी ‘वारिस पंजाब दे’ का दामन थाम लिया है। जानिए इस राजनीतिक कदम के बड़े मायने।
विधायक मनप्रीत सिंह अयाली ‘वारिस पंजाब दे’ पार्टी में शामिल
पंजाब की राजनीति में एक बार फिर बड़ा बदलाव देखने को मिला है। दाखा विधानसभा सीट से शिरोमणि अकाली दल के बागी विधायक मनप्रीत सिंह अयाली ने एक अहम कदम उठाया है। उन्होंने मंगलवार को चंडीगढ़ में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान खडूर साहिब के सांसद अमृतपाल सिंह के नेतृत्व वाले संगठन ‘वारिस पंजाब दे’ का दामन थाम लिया है।
इस बड़े फैसले ने राज्य के राजनीतिक समीकरणों को नई दिशा दे दी है। इस मौके पर अमृतपाल सिंह के पिता तरसेम सिंह, फरीदकोट के सांसद सरबजीत सिंह खालसा और दिवंगत दीप सिद्धू के भाई मनदीप सिद्धू विशेष रूप से मौजूद रहे। अयाली का यह कदम पंजाब की पंथक राजनीति में एक बड़े फेरबदल का संकेत दे रहा है।
शिरोमणि अकाली दल को पंजाब में लगा झटका
मनप्रीत सिंह अयाली का संगठन छोड़ना शिरोमणि अकाली दल के लिए एक बहुत बड़ा नुकसान माना जा रहा है। अयाली दाखा सीट से तीन बार के विधायक हैं और लुधियाना जिले में उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है। कुछ समय पहले ही उन्होंने पार्टी के बागी गुट शिरोमणि अकाली दल (पुनर् सुरजीत) के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया था।
लंबे समय से वे पार्टी नेतृत्व से नाराज चल रहे थे और सुधार की मांग कर रहे थे। अब उनके जाने से पंजाब विधानसभा में शिरोमणि अकाली दल की ताकत और भी कम हो गई है। पार्टी की जमीन लगातार खिसक रही है और अब उनके पास सदन में नाम मात्र के ही विधायक बचे हैं।
वारिस पंजाब दे संगठन से जुड़ने के मायने
‘वारिस पंजाब दे’ की स्थापना दिवंगत अभिनेता और कार्यकर्ता दीप सिद्धू ने की थी। वर्तमान में डिब्रूगढ़ जेल में बंद सांसद अमृतपाल सिंह इसका नेतृत्व कर रहे हैं। विधायक मनप्रीत सिंह अयाली का इस संगठन से जुड़ना इसे एक नई राजनीतिक ताकत प्रदान करता है।
अयाली ने स्पष्ट किया कि उन्होंने पंजाब और सिख समुदाय के अहम मुद्दों को उठाने के लिए यह फैसला लिया है। उनका मानना है कि युवाओं को नशे से बचाने और रोजगार दिलाने के लिए एक मजबूत मंच की जरूरत थी। ‘वारिस पंजाब दे’ इसी दिशा में काम कर रहा है और अब वे भी इस मुहिम का हिस्सा बन गए हैं।
विधानसभा सदस्यता और दल-बदल कानून का पेच
अयाली ने यह भी साफ कर दिया है कि वे विधायक पद से इस्तीफा नहीं देने वाले हैं। दल-बदल कानून को लेकर पूछे गए सवाल पर स्थिति बिल्कुल स्पष्ट है। ‘वारिस पंजाब दे’ अभी तक चुनाव आयोग में पंजीकृत राजनीतिक पार्टी नहीं है, यह एक सामाजिक और धार्मिक संगठन के रूप में कार्य कर रहा है।
इसी तकनीकी कारण से अयाली पर दल-बदल कानून लागू नहीं होता है और उनकी विधानसभा सदस्यता पूरी तरह से सुरक्षित है। हालांकि, शिरोमणि अकाली दल अब उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता जरूर दिखा सकता है।
पंथक एकता और सिखों के अधिकारों पर जोर
संगठन में शामिल होने के बाद अयाली ने पंथक एकता को अपना सबसे बड़ा लक्ष्य बताया। उन्होंने कहा कि पंजाब के हितों के लिए काम करने वाली सभी ताकतों को अपने आपसी मतभेद भुलाकर एक मंच पर आना चाहिए। जब तक सब एकजुट नहीं होंगे, तब तक राज्य की आवाज मजबूती से नहीं उठाई जा सकेगी।
उन्होंने बंदी सिखों (जेल में बंद सिख कैदियों) की रिहाई और पंजाब के पानी के अधिकारों के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। इसके अलावा, संगठन की तरफ से यह भी साफ किया गया कि वे संविधान के दायरे में रहते हुए शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से अपने सभी अधिकार मांगेंगे।
पंजाब के अगले विधानसभा चुनाव की तैयारी
यह राजनीतिक घटनाक्रम 2027 में होने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव की तैयारियों से जोड़कर देखा जा रहा है। ‘वारिस पंजाब दे’ संगठन ने पहले ही संकेत दे दिया है कि वे आगामी चुनावों में राज्य की सभी 117 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की योजना बना रहे हैं।
अयाली जैसे अनुभवी नेता के जुड़ने से संगठन को जमीनी स्तर पर चुनाव लड़ने में काफी मदद मिलेगी। यह नया गठबंधन राज्य में सत्ताधारी आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के साथ-साथ भाजपा को भी कड़ी चुनौती देने की रणनीति तैयार कर रहा है। आने वाले महीनों में कई और बड़े नेताओं के इस संगठन से जुड़ने की पूरी संभावना है।


